"जन्मदाता से कम नहीं थे आप मेरे लिए, फिर इतनी जल्दी क्यों छोड़ कर चले गए?"
आज नए साल 2026 का जश्न पूरी दुनिया मना रही है, लेकिन मेरे लिए आज सब कुछ ठहर गया है। ज्ञान की धरती बोधगया ले जाकर आपने मुझे जीवन का सार समझाया, बिहार के विकास का विजन दिया और एक पिता की तरह मेरा हाथ थामकर चलना सिखाया। आज यकीन नहीं हो रहा कि आप अब हमारे बीच नहीं हैं।
वह अनमोल यादें जो अब विरासत हैं:
*निस्वार्थ प्रेम*: कौन किसी के लिए इतना करता है कि खुद 'नॉन-वेज' खाना छोड़ दे? आपने मेरे लिए वो भी किया।
*मार्गदर्शन*: जब मैं राह भटक रहा था, आपने मुझे रैपिडो ज्वाइन करने से रोका और हाथ में कैमरा थमाकर 'पत्रकार' बना दिया।
*साथ*: गांधी मैदान में वो सुबह का टहलना, साथ में मेडिटेशन करना और घंटों बैठकर पॉडकास्ट की बारीकियों को सीखना—वो मेरे जीवन के सबसे सुनहरे पल थे।
*सुरक्षा:* "रणजीत कहाँ है?"—आपका यह पूछना ही मेरे लिए सबसे बड़ी हिम्मत थी। आपने कभी मुझे किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होने दी।
आपका अधूरा सपना, अब मेरा मिशन है
सर, आपने बिहार की प्रगति के लिए जो सपने देखे थे, गरीबों के लिए हॉस्पिटल खोलने का जो विजन दिया था, उसे अब मैं अपनी आँखों में सजाकर रखूँगा। आप चले तो गए, पर अपना 'विजन' मेरे पास छोड़ गए हैं।
*"अकेले रहना बहुत मुश्किल हो रहा है सर, हर पल आपकी कमी खल रही है। लेकिन मैं वादा करता हूँ कि आपके बताए रास्तों पर चलकर, आपके अधूरे सपनों को पूरा करूँगा। आप जहाँ भी हैं, मुझे हिम्मत दीजिए।"*
